Thursday, 28 October 2010

दृष्टिकोण

मिले संस्कार जो बाहर से
कुछ को बुद्धि ने स्वीकार किया
किन्तु अहं भाव होने के कारण
कुछ का प्रतिकार किया
बुद्धि के विश्लेषण के बाद
निज की सोच तैयार हुई
ये ही सोच आगे चलकर
जीवन का आधार हुई
इसी सोच को सही मानकर
सही-गलत का किया चयन
सही लगा जो मेरे मन को
शायद ना भाए किसी और के मन
ये ही ''दृष्टिकोण'' है
या मानो नज़र का फेर
कोई कहता है भोर हुई
कोई कहे सुबह होने में है कुछ देर
यहीं से भेद आता है हममें
यहीं से उठते हैं वाद-विवाद
आधार तो सब  का एक है-
फिर भी,
कोई सजदे में हाथ उठाता है
और कोई करे मंदिर में याद ११

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