Thursday, 28 October 2010

दृष्टिकोण

मिले संस्कार जो बाहर से
कुछ को बुद्धि ने स्वीकार किया
किन्तु अहं भाव होने के कारण
कुछ का प्रतिकार किया
बुद्धि के विश्लेषण के बाद
निज की सोच तैयार हुई
ये ही सोच आगे चलकर
जीवन का आधार हुई
इसी सोच को सही मानकर
सही-गलत का किया चयन
सही लगा जो मेरे मन को
शायद ना भाए किसी और के मन
ये ही ''दृष्टिकोण'' है
या मानो नज़र का फेर
कोई कहता है भोर हुई
कोई कहे सुबह होने में है कुछ देर
यहीं से भेद आता है हममें
यहीं से उठते हैं वाद-विवाद
आधार तो सब  का एक है-
फिर भी,
कोई सजदे में हाथ उठाता है
और कोई करे मंदिर में याद ११

तुम बिन ...

तुम बिन दिवाली सूनी है,
तुम बिन होली में रंग नहीं,
दीपक तो जलाएँ हैं लेकिन
अफ़सोस है तुम मेरे संग नहीं ११


मैं जानता हूँ तुम नहीं आओगे,
मै भी तो नहीं आ सकता हूँ,
तन से हम चाहे दूर रहें ,
मिलने की दुआएँ करता हूँ ११

कहता था तुम्हें नहीं याद करूंगा,
याद बहुत पर आती है,
जो चाह था वो पाया मगर,
तेरी ममता कहाँ मिल पाती है ११

मैने अपने हरि को देखा नहीं,
पर  तुम में उसको खोजा है,
जब तुम ही मेरे संग में नहीं,
मेरा हर दिन अब इक रोज़ा है ११

तुम भी तो दीप जगा  लेना,
अंधियारा कहीं ना रह जाएँ,
दीपों को जगाते हुए शायद,
तुम को भी मेरी याद आएं ११

तुम याद भले ही कर लेना,
पर आँख में पानी मत आएं,
खुशियों से भरा ये उत्सव है,
चेहरों पर ख़ुशी बस लहराएँ ११

Wednesday, 27 October 2010

अनंत सागर

हे अनंत सागर
तुम और मैं कितने एक सामान,
तुम भी निरंतर बह रहे,
मेरे भी आंसूं नहीं ले रहे थमने का नाम
जैसे आता है उफान तुझमें,
हर पूर्णिमा की रात को
मन मेरा भी व्यथित हो उठता है,
लेकर छोटी -छोटी बात को १
कमजोर हूँ ऐसा नहीं
मुझमें  भी तुझसा बल है,
अभिलाषाएँ मुझमें भी उतनी
जितना तुझ मे जल है १
भींगी हैं पलकें बस इसलिए
कभी कभी थक मैं जाता हूँ ,
फिर से खड़ा होने के लिए तेरे किनारे आता हूँ १
कहते हैं तेरे गर्भ में श्री हरि का वास है ,
वो ही निर्लेप नारायण हरि मेरे भी ह्रदय के पास है १
तेरे पास आता हूँ तुझमें -
अपनापन पाया है,
मुझमें भी तुझसी गहराई
तुझमें भी मेरा साया है १
शांत तो तू भी नहीं
तेरी लहरों मे भी शोर है,
शांत मेरा चित भी नहीं
हमे बांधती ये ही डोर है १
तू है अनंत,पर क्या -
जानता है अपनी क्षमताओं को ?
मैं भी अनंत,
पर हूँ स्यवं  की खोज में...
कोशिश कर रहा हूँ लांघने की-
जीवन विषमताओं को ११

अव्यक्त

उठती हैं तरंगे-
कुछ हलचल है,
बहते जल में भी कल कल है,
कोई खींचे अपनी और मुझे,
कोई बहुत करीब मेरे-
जो संग मे रहता हर पल है १
कोई प्रेरित करता भावों को,
मूक है किन्तु बोले भी,
बिन वाणी ही  मुझसे बात करे,
दृष्टि से ओझल वो कोन भला ?
जो प्रश्न हुआ है मेरे लिए १
बिन देखे जिसे महसूस करूँ,
आभास ह्रदय में होता है,
कोई है,कोई है मेरा अपना-
जिस से स्फुरित मन होता है १
मन क्या है ?
केवल भाव ही तो,
ये भाव कहाँ से उठते हैं ?
जो देते मेरा अस्तित्व  मुझे,
कौन  है इनका रचनाकार ?
कुछ है, कोई है, कोई तो है ११
मैं कैसे उपमा उसकी करूँ?
वो कौन है, क्या है कैसे कहूं ?
मूक है वो-
मैं भी चुप हूँ....
फिर भी मन को कुछ खींच रहा,
''अव्यक्त'' कहीं, कोई कुछ है,
उठती हैं तरंगे-
कुछ हलचल है....११