Sunday, 26 December 2010

हे अनंत ...


भूख प्यास रोक कर -
देह अग्न में झोंक कर,
केवल तुझे ही खोजता हूँ-
मैं खोजता केवल तुम्हे १
हो रूप-बेरूप -
या हो बहरूपिया ?
हे अनंत खोजता हूँ
अंत न मिले मुझे..
हो कल्पना का छोर तुम
या भ्रम हो मेरी बुद्धि का,
हे ब्रह्म तुमको खोजता हूँ
पर ब्रह्म न मिले मुझे १
तुम हो क्षितिज जो सत्य है
किन्तु है असत्य भी,
हे अगम्य छूना चाहू-
पर छू न पाऊ मैं तुम्हे ...
अव्यक्त होकर खेलते हो -
अदृश्य हो प्रेरित करे ,
हो मूक मुझको रच रहे
शब्दों से मैं भी खेलता हूँ
आज शब्द न मिले मुझे १
अनंत मन में भेद हैं-
अनंत तेरे नाम भी ,
हो मूल या हो भाग मेरा ?
तुम हो परे मेरी सोच से,
सीमाएँ तेरी छूना चाहूँ ,
किन्तु सक्षम नहीं मैं
लांघने कोअपनी हदें !!

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